जटायु और भीष्म: दो प्रतीक ‘इच्छा मृत्यु’ और कर्म के अटल सिद्धांत के
अध्यात्म और नैतिकता के धरातल पर रामायण और महाभारत के दो महान पात्रों—गीधराज जटायु और पितामह भीष्म—का अंत समय हमें कर्म की प्रधानता का एक अत्यंत मार्मिक और गहरा संदेश देता है। यद्यपि दोनों को ‘इच्छा मृत्यु’ का सामर्थ्य प्राप्त था, किंतु उनके प्राण त्यागने की परिस्थितियों में आकाश-पाताल का अंतर था।
मौत को ललकारने वाला भक्त: जटायु
जब रावण ने जटायु के पंख काट दिए और वे लहूलुहान होकर भूमि पर गिरे, तब काल (मृत्यु) उनके सम्मुख आ खड़ा हुआ। उस क्षण जटायु ने मृत्यु को अत्यंत निर्भीकता से ललकारा और कहा:
“खबरदार ऐ मौत! अभी आगे बढ़ने का दुस्साहस मत करना। मैं तुझे स्वीकार तो करूँगा, किंतु तब तक तू मुझे स्पर्श नहीं कर सकती, जब तक मैं अपने प्रभु श्री राम को माता सीता की सुधि (सूचना) न दे दूँ।”
यह जटायु की भक्ति और संकल्प का प्रताप था कि साक्षात् काल भी उनके सामने काँपता हुआ खड़ा रहा। जटायु ने मृत्यु को अपनी शर्त पर स्वीकार किया।
बाणों की शय्या पर रोते हुए पितामह भीष्म
दूसरी ओर महाभारत के महानायक भीष्म पितामह थे। वे महान तपस्वी थे, नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे और उन्हें पिता शांतनु से ‘इच्छा मृत्यु’ का वरदान प्राप्त था। परंतु विडंबना देखिए, वे छह महीनों तक बाणों की शय्या पर लेटे मृत्यु की प्रतीक्षा करते रहे। उनकी आँखों से अविरल अश्रु बहते थे। जब भगवान कृष्ण उनके पास जाते, तो भीष्म दहाड़ मारकर रो पड़ते थे।
भीष्म पूछते थे— “कन्हैया! मेरे किस पाप का यह परिणाम है कि आज मैं बाणों की शय्या पर लेटा तड़प रहा हूँ?”
रामायण और महाभारत: दो विपरीत दृश्य
इन दोनों प्रसंगों में एक अद्भुत विरोधाभास देखने को मिलता है, जो मानव जीवन की सार्थकता को स्पष्ट करता है:
विवरण रामायण (जटायु) महाभारत (भीष्म पितामह)
शय्या (Bed) भगवान श्री राम की गोद रूपी कोमल शय्या चुभने वाले तीक्ष्ण बाणों की शय्या
ईश्वर की स्थिति भगवान राम विलाप कर रहे हैं (रो रहे हैं) भगवान कृष्ण मन ही मन मुस्कुरा रहे हैं
पात्र की स्थिति जटायु प्रसन्न हैं और मुस्कुरा रहे हैं भीष्म पितामह पीड़ा में रो रहे हैं
ऐसा अंतर क्यों? कर्म का न्याय
प्रश्न उठता है कि एक पक्षीराज को प्रभु की गोद मिली और एक महान विद्वान को बाणों की शय्या? इसका उत्तर हमारे कर्मों में छिपा है:
भीष्म का मौन: भीष्म पितामह ने भरे दरबार में एक असहाय नारी (द्रौपदी) का अपमान होते देखा। द्रौपदी चीखती रही, सहायता की पुकार लगाती रही, लेकिन शक्तिशाली होते हुए भी भीष्म ने सिर झुका लिया। उन्होंने अधर्म का विरोध नहीं किया। नारी के अपमान को सहने और उसका मूक गवाह बनने का परिणाम यह हुआ कि उन्हें मृत्यु के समय बाणों की शय्या मिली।
जटायु का पराक्रम: जटायु के पास न तो भीष्म जैसी शक्ति थी, न वैसा राज्य। परंतु जब उन्होंने रावण द्वारा नारी (माता सीता) का अपमान होते देखा, तो वे चुप नहीं रहे। उन्होंने अपने प्राणों की बाहुति दे दी, लेकिन अन्याय के विरुद्ध लड़ते रहे।
नारी के सम्मान की रक्षा हेतु प्राण त्यागने वाले जटायु को प्रभु ने वह सम्मान दिया जो देवताओं को भी दुर्लभ है।
परम गति की प्राप्ति
अंततः भगवान श्री राम ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से जटायु का अंतिम संस्कार अपने हाथों से किया और कहा— “तात करम ते निज गति पाई।” अर्थात, जटायु ने अपने श्रेष्ठ कर्मों से वह परम गति प्राप्त की है, जिसे बड़े-बड़े योगी तपस्या से पाते हैं।
जटायु चतुर्भुज रूप धारण कर भगवान के धाम को सिधार गए। यह कथा सिद्ध करती है कि व्यक्ति की महानता उसके पद या शक्ति से नहीं, बल्कि संकट के समय उसके द्वारा किए गए नैतिक चुनाव और सत्कर्म से तय होती है।
(प्रस्तुति – आचार्य अनिल वत्स)
