Piercing: नाक- कान छेदना और खतना: परंपरा, विज्ञान और ऊर्जा प्रवाह का रहस्य

Piercing: नाक छिदाना या कान छिदाना या खतना कराना -ये क्रियायें ऊपर से समझ नहीं आतीं पर इनके पीछे काम करता है एक गहरा विज्ञान जो ऊर्चा प्रवाह की दिशा और दशा से जुड़ा एक गहन रहस्य है..

भारत में ग्रामीण समाज में बहुत पुरानी परंपराएँ रही हैं। आज भी कुछ गाँवों में आपको ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनके नाम असामान्य लगते हैं, जैसे कनछेदी लाल या नत्थूलाल। इन नामों के पीछे एक गहरी परंपरा छिपी है। पुराने समय में यदि किसी परिवार में लगातार बच्चे जन्म के बाद जीवित नहीं रहते थे, तो अगला बच्चा पैदा होते ही उसकी नाक या कान छेद दिए जाते थे। यदि नाक छेदी जाती तो उसका नाम नत्थूलाल रखा जाता, और यदि कान छेदा जाता तो उसका नाम कनछेदी लाल।

लोगों का अनुभव था कि नाक या कान छेदने के बाद बच्चे जीवित रहते हैं और उनकी जीवन-ऊर्जा में एक बुनियादी परिवर्तन आ जाता है। यह परंपरा हजारों वर्षों के अनुभव और प्रयोगों से विकसित हुई।

बाद में इस विषय पर रूस में भी शोध हुआ। किरलियान फोटोग्राफी ने यह दिखाया कि मनुष्य के शरीर में विद्युत प्रवाह ही स्वास्थ्य और बीमारी का मूल आधार है। इस विद्युत प्रवाह को शरीर के कुछ विशेष बिंदुओं से बदला जा सकता है। यही सिद्धांत आक्युपंक्चर की कला में उपयोग होता है। चीन में पाँच हजार वर्षों से आक्युपंक्चर का प्रयोग किया जा रहा है और अब तो रूस के अस्पतालों में भी इसे अपनाया गया है। आधुनिक यंत्रों से यह पता लगाया जाता है कि शरीर में विद्युत प्रवाह कहाँ बाधित हुआ है और वहाँ इलेक्ट्रिक शॉक देकर प्रवाह को पुनः सक्रिय किया जाता है।

कान छेदना नाथ संप्रदाय के योगियों द्वारा एक विशेष प्रकार के शॉक के रूप में खोजा गया था। इसी तरह के शॉक अन्य परंपराओं में भी पाए जाते हैं। उदाहरण के लिए, यहूदी और मुसलमानों में खतना की परंपरा है। यहूदी बच्चे का खतना जन्म के चौदह दिन के भीतर कर देते हैं। जननेंद्रिय की चमड़ी काटकर हटाई जाती है, जिससे शरीर को एक गहरा शॉक मिलता है।

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह शॉक जननेंद्रिय की विद्युत-ऊर्जा को सीधे मस्तिष्क की ओर प्रवाहित करता है, जिससे बच्चे की जीवन-धारा बदल जाती है। यहूदी समाज की असाधारण प्रतिभा और उपलब्धियाँ इस परंपरा से जुड़ी मानी जाती हैं। कार्ल मार्क्स, सिगमंड फ्रायड और अल्बर्ट आइंस्टीन जैसे महान विचारक और वैज्ञानिक इसी समुदाय से आए।

मुसलमानों में भी खतना होता है, लेकिन वह देर से किया जाता है। यहूदियों का विश्वास है कि जन्म के चौदह दिन के भीतर दिया गया पहला शॉक बच्चे के मस्तिष्क पर स्थायी प्रभाव डालता है और उसकी प्रतिभा को गहराई से प्रभावित करता है।

इस प्रकार, नाक- कान छेदना और खतना जैसी परंपराएँ केवल धार्मिक या सांस्कृतिक नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे शरीर की ऊर्जा और विद्युत प्रवाह से जुड़ा गहरा विज्ञान भी छिपा है।

(प्रस्तुति -आचार्य अनिल वत्स)

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