Mahashivratri 2026: आखिर भगवान शिव से इतनी नफरत क्यों करते थे राजा दक्ष? जानें इन 2 पौराणिक कथाओं का रहस्य
महाशिवरात्रि 2026: हिंदू धर्म में भगवान शिव को देवों के देव महादेव कहा जाता है, जिनकी पूजा पूरी दुनिया बड़ी श्रद्धा से करती है। इस साल 15 फरवरी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाएगा, जहाँ भक्त गंगाजल, बेलपत्र और भांग-धतूरे से भोलेनाथ को प्रसन्न करेंगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शास्त्रों में एक ऐसे व्यक्ति का भी वर्णन है जो महादेव से घोर ईर्ष्या और नफरत करता था? वह व्यक्ति कोई और नहीं, बल्कि राजा दक्ष प्रजापति थे।
दक्ष प्रजापति भगवान ब्रह्मा के मानस पुत्र थे, जिनका जन्म ब्रह्मा जी के दाएं अंगूठे से हुआ था। उनके मन में महादेव के प्रति द्वेष और अपमान की भावना इतनी गहरी थी, जिसे इन दो प्रमुख पौराणिक कथाओं के जरिए समझा जा सकता है।
पहली कथा: चंद्र देव और दक्ष का श्राप
राजा दक्ष की 84 पुत्रियां थीं, जिनमें से 27 का विवाह उन्होंने चंद्र देव के साथ किया था। हालांकि, चंद्र देव अपनी सभी पत्नियों में से सबसे सुंदर ‘रोहिणी’ को सबसे ज्यादा प्यार करते थे और बाकी 26 पत्नियों की अनदेखी करते थे। जब यह बात राजा दक्ष को पता चली, तो उन्होंने चंद्र देव को समझाया, लेकिन चंद्र देव के व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आया।
बेटियों का दुख देखकर क्रोधित दक्ष ने चंद्र देव को श्राप दे दिया कि उनकी चमक और सुंदरता धीरे-धीरे खत्म हो जाएगी और वे कुरूप हो जाएंगे। जब चंद्र देव का तेज घटने लगा, तब नारद मुनि की सलाह पर वे भगवान शिव की शरण में गए। शिवजी ने प्रसन्न होकर चंद्र देव को पूरी तरह नष्ट होने से बचा लिया और उन्हें अपनी जटाओं में स्थान दिया। यह देखकर दक्ष प्रजापति आगबबूला हो गए कि शिव ने उनके श्राप का प्रभाव कम कर दिया है। इसी बात को लेकर दक्ष और शिव के बीच भीषण युद्ध भी हुआ, जिसे रोकने के लिए स्वयं ब्रह्मा और विष्णु को आना पड़ा। तब से दक्ष शिवजी को अपना शत्रु मानने लगे।
दूसरी कथा: देवी सती और शिव का अपमान
दूसरी कथा माता सती के विवाह से जुड़ी है। राजा दक्ष भगवान शिव के ‘औघड़’ रूप (भस्म रमाए हुए और गले में सांप) को पसंद नहीं करते थे। वे नहीं चाहते थे कि उनकी पुत्री सती का विवाह शिव से हो। इसी वजह से जब दक्ष ने सती के विवाह के लिए स्वयंवर रखा, तो उन्होंने सभी देवताओं और गंधर्वों को बुलाया, लेकिन महादेव को जानबूझकर आमंत्रित नहीं किया।
इतना ही नहीं, शिवजी को नीचा दिखाने के लिए दक्ष ने मुख्य द्वार पर उनकी एक मूर्ति द्वारपाल के रूप में खड़ी कर दी। लेकिन सती ने उस मूर्ति के गले में ही वरमाला डाल दी, जिसके बाद शिव वहां साक्षात प्रकट हुए और सती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया। अपनी इच्छा के विरुद्ध हुए इस विवाह और भगवान शिव के प्रति अपनी हठ के कारण दक्ष प्रजापति के मन में महादेव के लिए घृणा और भी बढ़ गई।
