Sphatik Shila; चित्रकूट की वो दिव्य चट्टान जहाँ आज भी मौजूद हैं माता सीता के चरण चिन्ह, जानें जयंत के अहंकार & राम-बाण की कथा

Sphatik Shila: यहाँ इस लेख में उत्तराखंड की धर्मनगरी चित्रकूट में स्थित स्फटिक शिला के महत्व और उससे जुड़ी कथा का रसास्वादन कीजिये..

चित्रकूट की पवित्र भूमि पर, मंदाकिनी नदी के शांत किनारे एक ऐसी अलौकिक शिला (चट्टान) स्थित है, जिसे दुनिया ‘स्फटिक शिला’ के नाम से जानती है। यह पावन स्थल जानकी कुंड से लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में स्थित है। माना जाता है कि वनवास के दौरान प्रभु श्रीराम और माता सीता ने यहाँ अपने जीवन के सबसे सुखद और यादगार पल बिताए थे।

राम-सीता के प्रेम और श्रृंगार की साक्षी धार्मिक मान्यताओं और रामचरितमानस के अनुसार, यह वही शिला है जहाँ प्रभु श्रीराम स्वयं माता जानकी का श्रृंगार किया करते थे। इसी पत्थर पर बैठकर दोनों विश्राम करते थे, मंदाकिनी की लहरों को निहारते थे और चित्रकूट की प्राकृतिक सुंदरता का आनंद लेते थे। आज भी इस शिला पर माता सीता के पवित्र चरणों के निशान देखे जा सकते हैं, जिन्हें देखकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो जाते हैं।

इतना ही नहीं, इसी चट्टान पर वह निशान भी मौजूद हैं जहाँ श्रीराम ने घास के तिनकों से धनुष-बाण तैयार किया था। यहाँ इंद्र के पुत्र जयंत द्वारा किए गए अपराध की निशानी के रूप में उसकी चोंच का निशान भी भक्तों को दिखाया जाता है।

जब कौवे का रूप धरकर आए जयंत का अहंकार टूटा कथा के अनुसार, एक बार माता सीता इसी शिला पर बैठकर प्रकृति का आनंद ले रही थीं। तभी इंद्र का पुत्र जयंत कौवे का रूप धारण कर वहां पहुंचा। उसने माता सीता की शक्ति की परीक्षा लेने या उनके सौंदर्य के प्रति ईर्ष्या के कारण उनके चरणों में चोंच मारकर उन्हें घायल कर दिया।

जब माता के पैरों से रक्त बहने लगा, तो प्रभु श्रीराम अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने पास पड़े तिनकों को उठाया और मंत्र पढ़कर उन्हें ‘रामबाण’ बना दिया। जयंत अपनी जान बचाने के लिए तीनों लोकों में भागा, लेकिन किसी ने उसे शरण नहीं दी। अंत में, वह हारकर माता सीता के चरणों में गिर पड़ा और क्षमा मांगी। करुणामयी माता सीता ने उसे माफ कर दिया, लेकिन प्रभु का बाण बेकार नहीं जा सकता था, इसलिए दंड स्वरूप जयंत की एक आंख फोड़ दी गई। कहा जाता है कि तभी से कौवे की एक आंख कमजोर मानी जाती है।

आध्यात्मिक शांति और ऊर्जा का केंद्र स्फटिक शिला केवल एक साधारण पत्थर नहीं है, बल्कि यह दिव्य चेतना का केंद्र है। चारों ओर पहाड़ियों और हरियाली से घिरा यह स्थान आज भी एक विशेष सकारात्मक ऊर्जा से भरा हुआ महसूस होता है। भक्तों का मानना है कि इस शिला को छूने मात्र से मन के विकार दूर होते हैं और आत्मिक शांति मिलती है।

सदियों से यह स्थान तीर्थयात्रियों के लिए अटूट श्रद्धा का केंद्र रहा है। यह शिला हमें सिखाती है कि पत्थर में भी भगवान का वास हो सकता है यदि हमारी आस्था सच्ची हो। चित्रकूट आने वाले हर रामभक्त के लिए स्फटिक शिला के दर्शन करना अनिवार्य माना जाता है।

 

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