Maa Shakambhari Devi: माँ शाकंभरी महिमा: जब जगदम्बा ने अपने आंसुओं से बुझाई धरती की प्यास

 

हिंदू धर्मग्रंथों में माँ शाकंभरी को ‘प्रकृति की देवी’ और ‘पोषण की अधिष्ठात्री’ माना गया है। माँ का यह अवतार पूर्णतः दया और मानवता के कल्याण को समर्पित है। देवी भागवत पुराण के अनुसार, जब-जब सृष्टि पर अन्न और जल का संकट आता है, माँ शाकंभरी अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट होकर जीवों की रक्षा करती हैं।

शताक्षी और शाकंभरी: करुणा का दिव्य अवतार

दुर्गम दैत्य का आतंक और वेदों की चोरी

पौराणिक कथा के अनुसार, रुरु का पुत्र ‘दुर्गम’ नामक एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य था। उसने ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर चारों वेदों को अपने अधिकार में कर लिया। वेदों के लुप्त होने से समस्त शुभ कार्य, यज्ञ और तर्पण रुक गए। ब्राह्मणों का तेज क्षीण हो गया और देवताओं की शक्ति घटने लगी। परिणामस्वरूप, धरती पर लगातार सौ वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। नदियां सूख गईं, वनस्पतियां नष्ट हो गईं और चारों ओर हाहाकार मच गया।

 माँ का ‘शताक्षी’ (सौ नेत्रों वाला) स्वरूप

जब समस्त ऋषि-मुनि और देवता शिवालिक पर्वत की कंदराओं में एकत्रित होकर आद्याशक्ति की आराधना करने लगे, तब देवी एक अत्यंत करुणामय रूप में प्रकट हुईं। माँ के शरीर पर सौ नेत्र थे। धरती की प्यास और जीवों की तड़प देखकर माँ का हृदय भर आया और उनके सौ नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहने लगी। माँ के इन आंसुओं से ही सूखी हुई धरती फिर से हरी-भरी हुई और नदियों में जल प्रवाहित होने लगा। सौ नेत्रों के कारण माँ का नाम ‘शताक्षी’ पड़ा।

 शाकंभरी नाम की उत्पत्ति

भयंकर अकाल के कारण जब लोग भूख से मर रहे थे, तब माँ ने अपनी शक्ति से अनगिनत फल, सब्जियां, कंदमूल और औषधियां (शाक) उत्पन्न कीं। माँ ने स्वयं अपने हाथों से भूखे जीवों को भोजन कराया। चूँकि माँ ने ‘शाक’ (वनस्पतियों) द्वारा संसार का भरण-पोषण किया, इसलिए उन्हें ‘शाकंभरी’ कहा गया।

दुर्गम दैत्य का वध और वेदों की पुनर्स्थापना

अंत में, देवी और दुर्गम दैत्य के बीच भीषण युद्ध हुआ। माँ शाकंभरी ने अपनी महान शक्तियों से दुर्गम का वध किया और उसके चंगुल से वेदों को मुक्त कराकर पुनः देवताओं और ब्राह्मणों को सौंप दिया। दुर्गम का वध करने के कारण माँ का एक नाम ‘दुर्गा’ भी प्रसिद्ध हुआ।

शाकाहार का संदेश: जैसा कि कथा में वर्णित है, माता केवल सात्विक और शाकाहारी भोजन का भोग ग्रहण करती हैं। वे प्रकृति की रक्षक हैं।

नीलवर्ण देवी: माँ शाकंभरी का वर्ण नीला (नीलांजन) बताया गया है। उनके एक हाथ में कमल है और दूसरे हाथों में बाण, शाक-सब्जियां और फल होते हैं।

प्रमुख तीर्थ: उत्तर प्रदेश के सहारनपुर (सहारनपुर शक्तिपीठ), राजस्थान के सांभर और कर्नाटक के बादामी में माँ शाकंभरी के अत्यंत सिद्ध और प्राचीन मंदिर स्थित हैं।

मंत्र: नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः। नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम्॥

 

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